Wednesday, April 2, 2025

हिन्दी लघुकथा (अङ्क २२ मा प्रकाशित)


“मेरी मानो तो इस पुराने आउटडेटेड कंप्यूटर को मत बनवाओ, बेटा । ये बहुत मँहगा पडेगा । संभव है, ना भी बने । ये सरासर बेवकूफी ही होगी । आप कोई नया कंप्यूटर या लैपटाप ले लो बेटा । आज कल मार्केट में तो बढिया – बढिया, कंप्यूटर आ गये हैं, बेटा । 

“कंप्यूटर मैकेनिक पुराने गँदे कंप्यूटर पर नजर फिराते हुए बोला ।
“नहीं, पैसे की कोई बात नहीं है । आप प्लीज इसे किसी तरह चालू कर दीजिए ।’’ 

मैनिक – “इसे सरासर बेवकूफी ही कहेंगें बेटा जी । खैर;  इसे छोड़ जाईये मेरे पास । देखता हूँ बना तो ठीक नहीं तो ..।’’ 

“नहीं – तो मत ही  कहियेगा …। ये कहिये कि जरूर बन जायेगा ।’’ युवक मिन्नत करते हुए बोला ।

“इस शहर में सबसे पुरानी आपकी ही दुकान है । आपका लोग बडा नाम लेते हैं ।’’ 

“आखिर, ऐसा क्या है ? इस कंप्यूटर में ?’’ मैकेनिक चश्मे के पीछे से झाँकते हुए बोला ।

“दर असल ये कंप्यूटर मेरी माँ ने गिफ्ट किया था, मुझे । और ऐसे समय में मुझे गिफ्ट किया था । जिस समय मैं दसवीं कक्षा में पढता था । उस समय मैं कुछ भी नहीं था । मेरी माँ ने पाई – पाई जोड़कर ये कंप्यूटर खरीदा था । ये मेरी माँ की दी हुई सबसे अनमोल निशानी है । मेरी माँ दोने बनाती थी उसी पैसे से ये कंप्यूटर मेरे लिये खरीदा था । 

इसलिए, ये मेरे लिये दुनिया की सबसे कीमती चीज है ।’’ बूढे कंप्यूटर मैकेनिक के पैर काँपने लगे । दुनिया में ऐसे – ऐसे भले लोग भी हैं । मैकेनिक को अपने बहू की गालियाँ सुनाई पड़ने लगीं – 

“ ..ये बूढा डस्टबिन है ..इसको कब निकालकर बाहर फेंक रहे हो ?’’  

“बन जायेगा ना ।’’ युवक ने आश्वस्त होना चाहा ।

“जान लगा दूँगा बेटा । अपनी उम्र का जितना  तजुर्बा है । सब लगा दूँगा । अब भला इतने प्यार करने वाले लोग कहाँ मिलतें हैं ?ॅ’’

मैकेनिक की आँखें छलछला आईं थीं ।

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