Sunday, December 29, 2024

हिन्दी लघुकथा (अङ्क १९ मा प्रकाशित)

मान भी जाओ

- डोली शाह
हैलाकांदी असम–788162 भारत   


नौ बज चुके थे । बडी सी ताला लगा दोनों निकल पडे अपनी मंजिल की ओर । कागज पलटते कब स्ट्रीट लाइटें जल गई, पता भी ना चला । चंद्रमा भी अपना प्रकाश फैला ही चुका था । दोनों लौटते ही साथ घर पहुंचे ।

श्रीमान नरेश हाथ –पांव धो विश्राम करते अपने मोबाइल में लगे रहे, मंजू रात्रि भोजन हेतु रसोई घर बर्तनों से खेलने पहुंची । भांजी तैयार थी, चांदी जैसी लोइया बनने के लिए बिल्कुल तत्पर थी । 

कुछ वक्त पश्चात ही– “ऐ जी आइए भोजन तैयार है ।’’
“अरे मंजू, यही ला दो मन नहीं हो रहा है चलने का !’’
भोजन पर नजर दौडते ही, इतनी देर में बस यही बनाई, वह भी बिना किसी स्वाद के !’’

मंजू चुप्पी साधे सुनती रही । सारे कर्मों से निवृत्त होकर मंजू का उदास चेहरा देख– “क्या हुआ रानी, इतनी उदास ! और तुमने भोजन किया भी या नहीं ?’’ नरेश ने पूछा

मंजू दो पल मौन ही रही, 

“छोडिए ना, इससे आपको क्या है ? आपने तो भोजन कर ही लिया ना ? मैं करूं या ना करूं !

“अरे डार्लिंग, इतना गुस्सा क्यों, बताओ भी अब !

“क्या करना है, आपको तो सिर्फ अपनी ही चिंता है । आप कमरे से रसोई घर तक नहीं जा सकते, और मैं बनाकर लाइ फिर भी इतना…..

“ये भी तो सोचते, कि आखिर मैं भी तो आप ही के साथ आई थी,’’

अरे रानी, समझता हूं मैं भी… अब गुस्सा थूक भी दो ! ठीक है कल से मैं भी तुम्हारे साथ डिनर बनाने में हाथ बटा दूंगा ।

“हां –हां, हो गया, अब, मुझे और मत फुलाओ… आप

सौरी डार्लिंग, अब मान भी जाओ…“आप ना …..’’
“क्या …’’ नरेश जोर सेहंस दिया…

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