रिश्तों की महक
- देवराज डडवाल
फतेहपुर जिला, कांगडा हिमाचल प्रदेश
“अरे निशा, तुम तो मेरी आधी घरवाली हो ! कहते है ना साली... आधे घर वाली’’, - रमन ने शरारत भरे लहजे से कहा !
दीदी में कोई कमी है क्या ! हमारी दीदी तो लाखों में एक है ! -शर्माती निशा ने कहा !
जाते -जाते वह पैर पटकते हुए चली गयी !
रमन जब भी मिलता वह इसी तरह निशा को चिढाता और निशा ’धत्त’ कह कर वहां से भाग जाती !
एक दिन निशा अचानक वीमार पड़गई ! इधर -इधर से दवाइयाँ खाने के बाद वह शहर के बडे अस्पताल में पहुंचे !
“इसकी तो दोनों किडनियां खराब हो गयी हैं ! अब कोई किडनी डोनेट करने बाला मिल जाए या दस लाख रूपये तक का प्रबंध कर पाओ तभी हम अगली बात कर सकते हैं,’’ -डाक्टर ने कहा ।
यह सुन कर निशा की माता अचेत होकर गिर पडी जबकि इतने अधिक रूपये जुटा पाने में असमर्थ पिता दूर बैठा आंसू वहा रहा था !
“निशा, मैं कहता था ना कि तुम मेरी आधे घरवाली हो ! तुम चिंता मत करो, मैं तुम्हें किडनी डोनेट करूंगा ! तुम्हे मैं कुछ नही होने दूंगा,’’ - मुसीबत की इस घडी में भी रमन ने ठिठोली की तो निशा हंस पडी !
निशा ओपीडी में थी और बाकी परिजन बाहर बैठे उसके स्वस्थ होने की कामना कर रहे थे ! जबकि डाँक्टर आँपरेशन के लिए दोनो के आवश्यक टेस्ट व अन्य औपचारिकताएं पूरी करने में जुट गए ।
....साथ सहयोगको खाँचो
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