थिएटर का विशाल हाँल, मानो समय का प्रांगण हो—खाली, धूल से ढका, पर अब भी अपनी गूंज में जीवित । मंच पर पीली, मद्धिम रोशनी लटकी थी—एक अकेली धडकन की तरह, जो जीवन की संध्या में धीमे–धीमे झूल रही हो ।
अर्जुन, अब सिर्फ़अभिनेता नहीं, बल्कि एक यात्री था— जीवन के अंतिम दृश्य का यात्री । उसके हाथ में संवाद–पत्र नहीं, बल्कि वे अनकहे शब्द थे जिन्हें वह वर्षों से अपने भीतर सहेजता आया था ।
हर संवाद वह ऐसे बोल रहा था, जैसे समय की किताब का आखिरी पन्ना पढ़रहा हो ।
मंच के किनारे, उसे रीना का आभास हुआ— सहकलाकार नहीं, बल्कि वह प्रिय आत्मा, जो जीवन के पहले अंक में उसके साथ खडी थी, और अब किसी अदृश्य लोक से उसे देख रही थी । वह जानता था— यह अभिनय केवल दर्शकों के लिए नहीं, बल्कि उसके लिए भी है, जो उसे उस अंतिम पर्दा–गिरने के पार से पुकार रही थी ।
जब उसने आखिरी पंक्ति बोली— “अगर यह अन्त है, तो मैं इसे मुस्कान के साथ स्वीकार करता हूँ’’— तो यह संवाद मंच पर नहीं, जीवन के मंच से बोला गया था ।
रोशनी बुझ गई, पर अंधेरा भयावह नहीं था— वह एक कोमल परदा था, जो दो दृश्यों के बीच खिंचता है ।
अर्जुन ने अपनी स्क्रिप्ट फर्श पर रख दी, जैसे शरीर को धरती को सौंप दिया हो ।
अंतिम रिहर्सल पूरी हो चुकी थी । अब केवल पर्दा उठना बाकी था— उस अगले मंच पर, जिसे मनुष्य परलोक कहता है ।
-ग्रेट ब्रिटेन
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