Sunday, December 29, 2024

हिन्दी लघुकथा (अङ्क १९ मा प्रकाशित)

कीमत

- सुधिर केवलिया
जय नारायण व्यास नगर, बीकानेर  334003 भारत   


प्रसिद्ध साहित्यकार प्रोफेसर अमर के घर से बरसों से पुराने अखबार और सामान खरीदने वाला दीनू इस बार भी उनके घर पुराने अख़बार और सामान खरीदने के लिए पहुंचा था। प्रो. अमर के पुत्र राजन और पुत्रवधू नेहा ने कोने में पडी ढेर सारी किताबों की ओर इशारा करते हुए दीनू से, उनके लिए उस रद्दी की, सही कीमत देने के लिए कहा । पिछले महीने प्रो.राजन की मृत्यु के बाद उनके लिए, पहले की तरह अब भी, वह किसी काम की नहीं थी । किताबों को पलटकर देखने के बाद दीनू ने प्रो. अमर और अन्य साहित्यकारों द्वारा लिखित उन साहित्यिक किताबों के रद्दी की कीमत से ज्यादा रुपये उन्हे दे दिए। ज्यादा रुपये पाकर राजन और नेहा के चेहरे पर खुशी साफ दिखाई देने लगी थी ।  

दीनू ने उन किताबों को तरीके से अपनी टैक्सी में रख दिया । नेहा ने रुपये गिनते हुए हंसकर कहा  “दीनू, आज तुम्हे किसी दूसरी जगह जाने की जरुरत नहीं पडेगी । हमारे यहां से ही तुमने इतनी ज्यादा रद्दी मिल गई है ।’’ यह सुनकर दीनू की आंखें नम हो गईं । वह रुंधे हुए गले से बोला “हां, मैडम आपने सही कहा । मुझे आज किसी दूसरी जगह जाने की जरुरत नहीं । यहां से मैं सीधा स्टेट लाइब्रेरी जा रहा हूं । ये सभी किताबें प्रो. अमर के नाम से स्टेट लाइब्रेरी में दान स्वरूप दे दूंगा ।’’ यह कहकर दीनू ने अपनी टैक्सी स्टार्ट करी और वहां से चला गया । 

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