Wednesday, January 21, 2026

हिन्दी लघुकथा (अङ्क ३१ मा प्रकाशित)


उन्हें हमारे बगल के थ्री बीएचके फ्लैट में आये लगभग आठ–नौ महीने हो गये थे । उनके घर से उनकी, पत्नी और बेटा–बहू की आपस में लडने की आवाजें अक्सर आया करती थी । मेरी उनसे अच्छी दोस्ती हो गई थी, इसलिए कभी–कभी हम दोनों सुबह की सैर पर जाया करते थे ।

एक बार जब हम सैर पर गये तब उन्हें उदास देखकर मैंने पूछा – “क्या बात है श्याम सुन्दर जी, आज आप उदास नजर आ रहे हैं ?’’

“……………’’

वे कहीं खोये हुए थे, इसलिए उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया, तब मैंने उनकी एक बाँह पकड़कर झकझोरते हुए दोबारा पूछा ।

तब उन्होंने संक्षिप्त–सा जवाब दिया – “कुछ नहीं ।’’
“कुछ तो बात है, बताओगे नहीं ?’’ मैंने पूछा ।

“यार, बेटा–बहू से रोज–रोज के झगडे़ से हम दोनों पति–पत्नी तंग आ चुके हैं । वे दोनों हमारी सुनते ही नहीं । अपनी मनमानी करते रहते हैं ।’’ नम आँखों से श्याम सुन्दर जी ने बताया । फिर थोडा रुककर आँसुओं को पोंछते हुए पूछा – “यार एक बात बताओ, जब से हम रहने आये हैं, तब से कभी भी तुम्हें और बेटा–बहू को हमने आपस में लडते–झगडते नहीं देखा । क्या तुम्हारे बेटा–बहू तुम दोनों की बाते सुनते हैं ?’’

“नहीं ।’’ मैंने संक्षिप्त–सा उत्तर दिया ।

“फिर तुम्हारी उनसे बनती कैसे है ?’’ उन्होंने उत्सुकता से पूछा ।

“क्योंकि मैं और तुम्हारी भाभी चाहते हैं कि घर में शाँति बनी रहे । आपस में लडाई–झगडे न हो । इसलिए हमने निर्णय लिया था कि…’’ मैं थोडा रुका ।

“क्या निर्णय लिया था ?’’ उनकी उत्सुकता बढ़रही थी ।
“यही कि अब हम सदा घर में अंधे, गूंगे, बहरे बन के रहेंगे ।’’

-१६८– बी, सूर्यदेव नगर, इंदौर, भारत

.............................................................................‍
..‍.‍.‍साथ सहयोगको खाँचो
लघुकथा संसार र कविता संसार अनलाइन मासिक पत्रिकालाई
जीवित राख्नका लागि तपाईंको 
आर्थिक सहयोग महत्वपूर्ण हुन्छ ।

No comments:

Post a Comment