एक बार जब हम सैर पर गये तब उन्हें उदास देखकर मैंने पूछा – “क्या बात है श्याम सुन्दर जी, आज आप उदास नजर आ रहे हैं ?’’
“……………’’
वे कहीं खोये हुए थे, इसलिए उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया, तब मैंने उनकी एक बाँह पकड़कर झकझोरते हुए दोबारा पूछा ।
“यार, बेटा–बहू से रोज–रोज के झगडे़ से हम दोनों पति–पत्नी तंग आ चुके हैं । वे दोनों हमारी सुनते ही नहीं । अपनी मनमानी करते रहते हैं ।’’ नम आँखों से श्याम सुन्दर जी ने बताया । फिर थोडा रुककर आँसुओं को पोंछते हुए पूछा – “यार एक बात बताओ, जब से हम रहने आये हैं, तब से कभी भी तुम्हें और बेटा–बहू को हमने आपस में लडते–झगडते नहीं देखा । क्या तुम्हारे बेटा–बहू तुम दोनों की बाते सुनते हैं ?’’
“नहीं ।’’ मैंने संक्षिप्त–सा उत्तर दिया ।
“फिर तुम्हारी उनसे बनती कैसे है ?’’ उन्होंने उत्सुकता से पूछा ।
“क्योंकि मैं और तुम्हारी भाभी चाहते हैं कि घर में शाँति बनी रहे । आपस में लडाई–झगडे न हो । इसलिए हमने निर्णय लिया था कि…’’ मैं थोडा रुका ।
-१६८– बी, सूर्यदेव नगर, इंदौर, भारत
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