पशबाना चाची ने रहमान चाचा के जख्मों को साफ करते हुए कहा, ‘आपको कितना समझाया था कि शहर के हालात ठीक नहीं हैं । घर में रहो । पर, आप हो कि बिना कुछ सोचे–समझे, निकल गए दंगाइयों को समझाने के लिए ।’
‘आह !’ रहमान चाचा ने दर्द से कराहते हुए पानी माँगा ।
‘देखा ! दंगाइयों ने आपकी क्या हालत बना दी । आपको इन जालिमों पर बहुत नाज था न !’
‘आह !’ रहमान चाचा ने दर्द से कराहते हुए जैसे – तैसे पानी के दो – चार घूँट अपने हलक में उतारे और फिर बिस्तर पर लुढक गये ।
‘आपने क्या सोचा था, दंगाई आपका कहा मान, आपके सामने हथियार डाल देंगे ! दिल का बैर – भाव भुलाकर, सीने से लग जायेंगे । पर …., आप क्या जानो, अब आदमी कितना बदल गया है । आपस का भाईचारा, सद्भाव, विश्वास, प्रेम भाव अब न जाने कहां खो गया है । बुजुर्गों का मान रखना, उनकी इज्जत करना, उनका कहा मानना, अब बीते दिनों की बात हो गयी है । जिसे देखो, वही, एक – दूसरे के लहू का प्यासा हो गया है ।’
रहमान चाचा, जो बहुत देर से चाची की बातें सुन रहे थे, ने अपनी चुप्पी तोडते हुए कहा, ‘शबाना ! क्या, मैं अपनी जरा – सी जान को बचाने की खातिर अपने शहर को चंद वहशियों के हवाले कर दूँ ? मैंने इस देश का नमक खाया है, इसकी जान – माल की हिफाजत करना, मुझ जैसे हर भारतीय का कर्तव्य है । यदि आज मैं सही वक्त पर वहांं नहीं पहुंचा होता तो सारा शहर दंगाइयों की गिरफ्त में आ गया होता और यहाँ का अमन – चैन खतरे में पड जाता । मुझे फख्र है कि आज मैंने अपने बदन पर चाहे जितने जख्म सह लिए हों, पर मैंने आज अपने शहर को जख्मी होने से बचा लिया ।’ इतना कहते–कहते वे एक बार फिर दर्द से कराहे और वहीं निढाल हो गए ।
सच है, आज देश को रहमान चाचा जैसे मसीहा की बहुत जरूरत है ।
- जूना बाजार, मक्सी जिला– शाजापुर (म.प्र.) भारत
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