Friday, January 24, 2025

हिन्दी लघुकथा (अङ्क २० मा प्रकाशित)


ज कैलेंडर बहुत उदास था । दीवारों और हवाओं ने पूछा – “उदास क्यों हो, कैलेंडर भाई ?’’ 

कैलेंडर मायूस स्वर में बोला – “यार लोग तारीखों को भी बाँटने लगे हैं । अपने पहले से बँटे होने का रंज तो था ही, मुझे । लोग तारीखों और महीनों को भी अब बाँटने लगे हैं । पहले साल में एक ही बार नववर्ष आता था । अब साल में दो–दो नववर्ष आने लगे हैं । आदमी–आदमी से में बँटता जा रहा है ।’’ इतना कहकर कैलेंडर जोर जोर से रोने लगा ।

हवा भी कैलेंडर को देखकर सिसकने लगी, बोली – “भाई, तुम इतने से परेशान हो । हवाओं में भी अब नफरत मिलाई जा रही है । लोगों को एक दूसरे से दूर करने की एक कवायद सी चल पडी है । इंसानी रिश्ते तार–तार हो रहें हैं ।’’

रँगों ने अपना दुखडा रोया – “भाई तुम लोग सही कह रहे हो । अब रंगों को भी बाँटने में लगे हैं, ये लोग । सोचो बिना रँगों और त्योहारों के कैसा होगा आदमी का जीवण । सचमुच खाई बढाने की ये एक अनोखी कवायद सी चल पडी है ।’’ 

तीनों भविष्य की ओर ताक रहें थें ।
दीवार बोला – “आदमी जब टुकडों में बँट जायेगा तो बचेगा क्या ?’’
तीनों लोग मायूस होकर दीवार को ताकने लगे !

- मेघदूत मार्केट, फुसरो बोकारो, झारखंड– ८२९१४४ भारत

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