आज कैलेंडर बहुत उदास था । दीवारों और हवाओं ने पूछा – “उदास क्यों हो, कैलेंडर भाई ?’’
कैलेंडर मायूस स्वर में बोला – “यार लोग तारीखों को भी बाँटने लगे हैं । अपने पहले से बँटे होने का रंज तो था ही, मुझे । लोग तारीखों और महीनों को भी अब बाँटने लगे हैं । पहले साल में एक ही बार नववर्ष आता था । अब साल में दो–दो नववर्ष आने लगे हैं । आदमी–आदमी से में बँटता जा रहा है ।’’ इतना कहकर कैलेंडर जोर जोर से रोने लगा ।
हवा भी कैलेंडर को देखकर सिसकने लगी, बोली – “भाई, तुम इतने से परेशान हो । हवाओं में भी अब नफरत मिलाई जा रही है । लोगों को एक दूसरे से दूर करने की एक कवायद सी चल पडी है । इंसानी रिश्ते तार–तार हो रहें हैं ।’’
रँगों ने अपना दुखडा रोया – “भाई तुम लोग सही कह रहे हो । अब रंगों को भी बाँटने में लगे हैं, ये लोग । सोचो बिना रँगों और त्योहारों के कैसा होगा आदमी का जीवण । सचमुच खाई बढाने की ये एक अनोखी कवायद सी चल पडी है ।’’
---------------------------------------
जीवित राख्नका लागि तपाईंको
आर्थिक सहयोग महत्वपूर्ण हुन्छ ।


No comments:
Post a Comment