Thursday, December 5, 2024

हिन्दी लघुकथा (अङ्क १८ मा प्रकाशित)

सुकून

- संजय मृदुल
भावना नगर, रायपुर छत्तीसगढ, भारत   


आज फिर शाम दफ्तर से वापस आने के बाद अनु और वासु लड़ने लगे । वजह ? रोज़कोई न कोई वजह निकल ही जाती थी । कभी पलंग पर पडे कपडे तो कभी टिफिन में बेस्वाद बनी सब्जी ।

आज ऐसी ही कोई वजह थी कि दोनों चाय खत्म होने से पहले ही शुरू हो गए । छोटा आरव शाम होते ही कमरे में बंद हो जाता था, अनु के आते ही राधा बाई घर चली जाती है । और आरव को उसका जाना बिल्कुल पसंद नहीं । जब तक वो रहती है उसका कितना खयाल रखती है । मां तो बस लडाई के बाद मुंह फुलाकर लैपटाप लेकर बैठ जाती है और पापा कपडे बदल बाहर चले जाते हैं ।

बेहतर जीवन की चाह में अनु और वासु कितना कुछ खो रहे हैं उन्हें आज अंदाजा भी नहीं । नौकरी, पैसे, फ्लैट, गाडी और सुविधाओं के फेर में जीवन बस लडाई का मैदान बन गया है ।

मोबाइल पर आरव एक रील देख रहा है जिसमें एक परिवार समुद्रकिनारे एक दूसरे का हाथ पकडे लहरों को पैरों से सहलाते हुए चले जा रहे हैं । उसने सोचा काश ऐसा मैं भी कर पाता अपने मम्मी पापा के साथ ।



....साथ सहयोगको खाँचो

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