Thursday, December 5, 2024

हिन्दी लघुकथा (अङ्क १८ मा प्रकाशित)

 जुण

- सुनिल गज्जाणी
भारत   


‘‘आखिर मेरे भाग्य में ही ऐसा लिखा है तो मैं इसके खिलाफ होकर अपने सपने कैसे साकार कर सकती हूँ, जब भाग्य ही ऐसा गुदा गया हो तो अपने मन से छलवा जाने क्यूँ कर रही हूँ ! सिर्फ तकदीर को कोसने के सिवाय मेरे हाथ में है क्या.....!’’

’’आय-हाय ! तेरे मन में फिर से औरत पैदा हो गयी क्या री ? हम इस बच्चे की बधाइयाँ लेने आये हैं ! दुआएं देने आये हैं, बच्चे से खेलने, खिलाने नहीं ! है री चमेली, तू इतनी देर से बच्चे को गोद में लिए इसे टुकुर-टुकुर देखती हुई जाने क्या सोचे जा रही थी ! तुझे यूँ देख बच्चे की माँ का कलेजा कैसे मुँह को आ गया !’’

’’माई री जी मत उठा ! ऐसे मौके पर मैं जब भी कहीं जाती हूँ तो बच्चे को देखते ही अपने बचनपन को याद कर उठती हूँ ! इन उम्र में मैं भी किसी का बीटा थी मगर जब बडा हुआ तो.... !’’ 

’’है री फिर से अतीत कुरेदने लगी ?!“’

’’सखी चंपा ! पता नहीं क्या कुरेद रही हूँ, अपने इंसानी जिस्म को, अपनी किन्नर जुण को या अपने प्रारब्ध को !’’


....साथ सहयोगको खाँचो

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