"यार ! तेरे बापू के जरा–सा डाँटने–फटकारने पर तू तो बडे जोश में शहर यह कहकर गया था कि नौकरी करेगा । अब कभी भी खेती–बाडी नहीं करेगा । फिर वापस इतनी जल्दी क्यों आ गया?” किशन ने कैलाश से पूछा ।
“यार ! अब तुझसे क्या छुपाना । वहाँ फेक्ट्री का मालिक मुझे बार–बार डाँटता–फटकारता रहता था, इसलिए मैं नौकरी छोड़कर वापस गाँव आ गया ।”
“यार ! यहाँ तेरे बापू भी तो तुझे डाँटते–फटकारते हैं?”
“यार ! फेक्ट्री मालिक के डाँटने–फटकारने और बापू के डाँटने–फटकारने में बहुत अन्तर है ।”
“क्या अन्तर है?” मैंने उत्सुकतावश पूछा ।
“यार ! फेक्ट्री के मालिक की डाँट–फटकार में सिर्फ और सिर्फ गुस्सा होता था । जबकि बापू की डाँट–फटकार में प्यार छुपा होता है ।”
- सूर्यदेव नगर, इन्दौर (भारत)
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