Tuesday, July 14, 2026

हिन्दी लघुकथा (अङ्क ३६ मा प्रकाशित)


"यार ! तेरे बापू के जरा–सा डाँटने–फटकारने पर तू तो बडे जोश में शहर यह कहकर गया था कि नौकरी करेगा । अब कभी भी खेती–बाडी नहीं करेगा । फिर वापस इतनी जल्दी क्यों आ गया?” किशन ने कैलाश से पूछा ।

“यार ! अब तुझसे क्या छुपाना । वहाँ फेक्ट्री का मालिक मुझे बार–बार डाँटता–फटकारता रहता था, इसलिए मैं नौकरी छोड़कर वापस गाँव आ गया ।”

“यार ! यहाँ तेरे बापू भी तो तुझे डाँटते–फटकारते हैं?”

“यार ! फेक्ट्री मालिक के डाँटने–फटकारने और बापू के डाँटने–फटकारने में बहुत अन्तर है ।”

“क्या अन्तर है?” मैंने उत्सुकतावश पूछा ।

“यार ! फेक्ट्री के मालिक की डाँट–फटकार में सिर्फ और सिर्फ गुस्सा होता था । जबकि बापू की डाँट–फटकार में प्यार छुपा होता है ।”

- सूर्यदेव नगर, इन्दौर (भारत)

..............................................................................‍
..‍.‍.‍साथ सहयोगको खाँचो
लघुकथा संसार र कविता संसार अनलाइन मासिक पत्रिकालाई
जीवित राख्नका लागि तपाईंको 
आर्थिक सहयोग महत्वपूर्ण हुन्छ ।

No comments:

Post a Comment