Tuesday, July 14, 2026

हिन्दी लघुकथा (अङ्क ३६ मा प्रकाशित)


वह कुछ सोचकर ही गर्मी की धूप में रास्ता तय कर, पसीने से भीगा घर पहुँचा । देखा, पत्नी टी.वी. के सामने अपना मनपसंद सीरियल ‘शांति’ देख रही थी । पर उसे वापस भी आँफिस जाना था, इसलिए पत्नी से अनुरोध किया — “जल्दी से खाना दे दो, खाकर वापस जाना है ।”

पत्नी को अपना मनपसंद सीरियल देखने में व्यवधान हुआ । वह चाहती थी कि यह एपिसोड पूरा देख ले, फिर उठकर खाना दे । इसीलिए टी.वी. के सामने बैठे–बैठे ही बोली — “थोडा रुक जाओ, ‘शांति’ का यह एपिसोड पूरा देख लूँ, फिर उठकर भोजन लगाती हूँ ।”

पत्नी का उत्तर सुनकर पति उतावला होकर बोला — “मुझे जल्दी है ।”

पति की ‘जल्दी’ की बात सुनकर पत्नी को गुस्सा आ गया, क्योंकि वह अपना पसंदीदा सीरियल अधूरा छोड़ना नहीं चाहती थी । इसीलिए उलाहने के लहजे में बोली — “इतनी जल्दी थी तो आँफिस के पास ही किसी होटल में कुछ खा लेते । इतनी धूप में घर आने की क्या जरूरत थी?”

पत्नी की बात सुनकर पति को ग्लानि महसूस हुई । क्या सोचकर घर आया था और क्या मिला ! कुछ पल सोचा, फिर निर्णय किया कि आज के खाने के लिए कहीं शाम को वापस आने पर घर की ‘शांति’ ही न भंग हो जाए । इसीलिए भविष्य के परिणाम को सोचकर वह उलटे पाँव यह कहते हुए वापस ऑफिस के लिए निकल गया — “जा रहा हूँ, राह में कुछ खा लूँगा । लेकिन सीरियल खत्म होते ही आप दरवाजा बंद कर देना ।”

घर की ‘शांति’ के लिए पति को यही निर्णय सबसे सही लगा ।

- लखनऊ, भारत

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