Tuesday, September 15, 2026

हिन्दी लघुकथा (अङ्क ३८ मा प्रकाशित)


 शीला को उस की पचासवीं वर्षगाठ पर एक ऐसा उपहार मिला जिस को  देखते ही वह हक्की – बक्की हो गयी ।अगले दिन वह जा धमकी पूजा के घर ।

“तुम इस साडी को पहचानती न ?’’ शीला ने तमतमाते हुए पूजा से पूछा ।

साडी को देख कर पूजा के पसीने छूट गये ।

“नहीं तो ।’’

“क्यों बनती हो ? ये वही साडी है जो मैंने बडी रीझ से तुम्हारी बेटी   कमलेश के ब्याह पर उस को दी थी । साडी उठा कर तुमने सावित्री को दे दी, न जाने किस खुशी के अवसर पर ? तुम क्या जानो उपहार का मान करना ?’’ कह कर शीला जैसी आयी थी वैसी ही मुड़गयी ।

– भारत

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