Showing posts with label शर्मिला चौहान. Show all posts
Showing posts with label शर्मिला चौहान. Show all posts

Tuesday, September 15, 2026

हिन्दी लघुकथा (अङ्क ३८ मा प्रकाशित)


विश्व के दो देशों के बीच युद्ध हो रहा था और बाकी देशों ने अपनी अपनी मजबूरी स्पष्ट कर दी । एक बडी मछली, दुनिया के समंदर में अपने से छोटी कम सशक्त मछली को अपने में समा लेने को लालायित थी ।

बडी, सशक्त और लडाकू सेना सुसज्जित होकर, छोटे देश के विभिन्न शहरों पर कब्जा जमाने का प्रयास कर रही थी । आक्रमणकारियों के तमाम विध्वंस के बावजूद, उस देश ने घुटने नहीं टेके । निवासी बंकरों में, घरों में कैद भूखे प्यासे अपने देश के लिए जान की बाजी लगाने को तैयार हो रहे थे ।

बच्चों और बुजुर्गो को छोड़कर, सभी ने देशरक्षा हित हथियार उठा लिया । सडकों पर आक्रमण कारी सैनिकों का काफिला घूम रहा था । सडक पर किसी को भी देखकर तुरंत गोली चलाने के आदेश का वो पालन कर रहे थे ।

“ऐ.. ! कहाँ जा रहे हो ? जाओ अपने घर में, वरना मुझे गोली चलानी पडेगी ।’’ दस–बारह साल के एक लडके को सडक पर देखकर शत्रु सैनिक चिल्लाया ।

“यह सडक मेरे देश की, यह शहर मेरे देश का और मैं इस देश का हूँ । मैं क्यों भागूँ, तुम भागोगे । मेरा पूरा परिवार युद्ध के लिए तैयार हो रहा है, सिर्फ दादी और मैं रह गए ।’’ उस बच्चे की आँखों में अपने देश की जीत के प्रति चमक देखकर शत्रु सैनिक एक क्षण के लिए काँप गया । 

उस बच्चे ने झपटकर सैनिक के हाथों से बंदूक छीन ली और अगले ही क्षण कई दिशाओं से एक साथ कई गोलियों की आवाजें गूँजने लगीं ।

अब सडक पर पडे दोनों देशभक्तों के, पार्थिव शरीर से मुक्त होती आत्माएँ गले मिल रहीं थीं ।

– महाराष्ट्र– ४००६१० भारत

..............................................................................‍
..‍.‍.‍साथ सहयोगको खाँचो
लघुकथा संसार र कविता संसार अनलाइन मासिक पत्रिकालाई
जीवित राख्नका लागि तपाईंको 
आर्थिक सहयोग महत्वपूर्ण हुन्छ ।