Wednesday, April 2, 2025

हिन्दी लघुकथा (अङ्क २२ मा प्रकाशित)


हिला दिवस धूमधाम से मनाने के लिए शहर की गलियों और चौकों पर पोस्टर चिपकाये हुए थे । लाउडस्पीकर से शहर में मुनादी करायी जा रही थी कि शोषित और पीडित महिलाओं के हर दुःख और तकलीफ को दूर किया जायेगा । भला ऐसा कौन सा घर होगा, यहां महिलाओं को परेशान न किया जा रहा हो । पीडित महिलाओं के मन में आशा की किरण उदय हो गयी । वह मन में बहुत उम्मीद लगा कर सभा स्थल पर पहुंची । कांफ्रेंस हाल जरूरत से ज्यादा भरा हुआ था । मंच बैनरों से सजाया हुआ था । अध्यक्ष और मुख्य अतिथि के आने की प्रतीक्षा हो रही थी । उनके आते ही लोगों में हलचल पैदा हो गयी ।

“अरे यह तो वही विमला है, जिसने पिछले वर्ष अपनी बहु को जला दिया था ।’’

“अरे यह जो मुख्य अतिथि है यह सत्या है, जिसने अभी कुछ माह पूर्व ही अपनी बहु को घर से बाहर कर दिया था ।’’

कांफ्रेंस हाल में ऐसी धीरे–धीरे बातें होने लगीं । फिर देखते ही देखते कार्यक्रम समाप्त हो गया । सभी अनुभव करने लगे कि वे जिस आशा की किरण को लेकर आये थे वह धुंधली हो गयी है ।

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